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सच्चाई की जीत

सच्चाई की जीत


 

 

 एक कलिंग नामक ग्वाला पहाड़ के निकट अपनी बहुत सारी गायों के साथ बहुत सुख-शन्ति से रहता था। उसकी गायों में पुण्यकोटि नाम की एक गाय थी, जो अपने बछड़े को बहुत प्यार करती थी। प्रतिदिन रोज शाम के समय वह रंभाती और दौड़ती हुई घर लौट कर ही आती थी।

 

उसी पहाड़ में एक शेर भी रहता था। एक बार की बात है वो शेर बहुत दिनों से भूखा था उसे खाने को कुछ खाने को नहीं मिला। उसने एक दिन शाम को पुण्यकोटि गाय को रोका और बोला -- ' मैं तुम्हें अपना आहार बनाऊँगा।'

 

पुण्यकोटि ने शेर से बड़ी शन्ति के साथ कहा - ' तुम मुझे घर जाने दो, बछड़े को दूध पिलाने के बाद मैं खुद तुम्हारे सामने हाजिर हो जाउंगी।'

 

फिर शेर ने सोचा ऐसे में इसे जाने दूंगा तो कही ये मुझे बेवकूफ बनाके न भाग जाये। तो शेर ने उसकी बात न मानी, पर जब पुण्यकोटि ने विश्वास दिलाया कि वह जरूर ही वापस आने का वचन दे रही है, तो शेर ने कहा -- 'अच्छा, तुम जा सकती हो, लेकिन अपना वचन निभाना भुलाने की गलती मत कर देना ।'

 

गौशाला में बछड़े को दूध पिलाते समय पुण्यकोटि ने उसको वह समाचार दिया और आँखों में आँसू भर कर अपने बछड़े से विदा ले ली। बाहर निकलते वक़्त उसने बछड़े से कहा -- ' बेटा, सावधानी से और सबके साथ प्यार से रहना।'

 

फिर पुण्यकोटि ने अन्य गायों से कहा -- 'बहनों, मैं तो जा रही हूँ, लेकिन मेरे बछड़े को भी अपना बच्चा समझकर ही इसका ध्यान रखना।'

 

फिर पुण्यकोटि ने शेर के पास जाकर कहा -- 'लो, शेर में आ गई , अब तुम मुझे खा लो।'

शेर ने भी सोचा कि ये कितनी अच्छी गाय है वचन निभाने के लिए मेरे पास फिर से आ गई। इस गाय को अपना आहार बना लेना तो बहुत बुरा होगा। यह सोचकर उसने उस गाय को छोड़ दिया और आगे के लिए अन्य सब गायों को भी अभयदान दे दिया।


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